एनडीए सरकार की बढ़ती ताकत | विपक्ष के कमजोर क्या प्यादे गिर रहे हैं!

देश की राजनीति में इस समय पर जोड़-तोड़ का कार्य चल रहा है। एनडीए सरकार को संसद में अपना समर्थन बढ़ाना है। संख्या को कम से कम इतना लेकर जाना है, कि वह परिसीमन के विधेयक को महिला आरक्षण के विधेयक को पास करवा सकें। यह उनके लिए बहुत जरूरी है तृणमूल कांग्रेस को लेकर जो खबरें चल रही हैं समाजवादी पार्टी को लेकर और उद्धव ठाकरे के शिवसेना को लेकर जो खबरें हैं यह सब इसी गणित का हिस्सा है। उधर दक्षिण में डीएमके की असंतुष्ट स्थिति भी काम में लाई जा सकती है। अब देखना यह होगा कि बीजेपी कितना समर्थन जुटा पाती है इसकी पूरी गणित को कुछ इस प्रकार से समझेंगे। 

तृणमूल कांग्रेस की बिखरती शक्ति :

हाल में तृणमूल कांग्रेस के सांसदों में भी बगावत हो गई है। पहले तो विधानसभा में कई नेताओं ने बगावत कर दी पार्टी के हाई कमान की बात मानने से इनकार कर दिया। यह सब ममता बनर्जी के चुनाव हार जाने के बाद हुआ है, उससे पहले तक सब ठीक था टीएमसी की सरकार थी और एक बार फिर से सरकार बनने की आश थी तब तक सब ठीक था लेकिन जैसे ही चुनाव हार गई ममता बनर्जी सारा मामला बिगड़ गया, सारे नेता अपने-अपने रास्ते निकल पड़े। ऋतव्रत बनर्जी के नेतृत्व में 58 विधायकों ने बगावत कर दी और उन्हें अपना विधानसभा अध्यक्ष घोषित कर दिया। जबकि ममता बनर्जी और पार्टी के महासचिव अभिषेक बनर्जी ने शोभनदेव चट्टोपाध्याय को अपना विपक्ष का नेता चुना था। ऋतव्रत बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस के इन 58 विधायकों के अलग हो जाने के बाद अब विधानसभा में ममता बनर्जी के पास केवल 22 विधायक रहे हैं ऐसे में बगावत दिल्ली तक देखने को नहीं मिलती ऐसा कैसे हो सकता है। दिल्ली में तृणमूल कांग्रेस के इस समय पर 28 सांसद हैं जिनमें 20 सांसदों ने बगावत कर दी है और एक छोटे अपेक्षाकृत क्षेत्रीय दल एनसीपीआई में अपना विलय कर लिया है।

टीएमसी के बागी सांसदों का भविष्य :

इन सांसदों ने बगावत तो कर दी है चाहते तो यह सीधे जाकर भारतीय जनता पार्टी में सम्मिलित हो जाते लेकिन ऐसा नहीं किया गया क्योंकि इसकी वजह से एक संदेश देश और पश्चिम बंगाल में इस तरह का जाता कि जिस टीएमसी के खिलाफ भारतीय जनता पार्टी को वहां के लोगों ने चुना था तृणमूल कांग्रेस के सभी नेता जाकर उसी भाजपा में शामिल होने लगे हैं। इससे बचने के लिए यह सभी सांसद एनसीपी नाम की एक छोटी क्षेत्रीय संगठन में जुड़ गए और बाहर से एनडीए की सरकार को समर्थन देने की बात कही है। ऐसे में क्योंकि सांसदों की संख्या 20 है तो दो तिहाई की जो बात होती है दल बदल नियम के अनुसार उसका उल्लंघन भी नहीं है। इस तरह से यह बड़ा सुरक्षित रास्ता तृणमूल कांग्रेस के नेताओं ने अपने लिए तैयार किया। 

उद्धव ठाकरे की शिवसेना फिर से टूटी :

महाराष्ट्र की राजनीति में यह पहली बार नहीं है इन कुछ वर्षों में शिवसेना में जिस तरह से फूट पड़ी है वह एक रोचक दृश्य बनाती है। राजनीति में ऐसी घटनाएं नई तो नहीं है लेकिन यह जब भी होती है दिलचस्प होती हैं। उद्धव ठाकरे पहले भी इसी प्रकार का विघटन देख चुके हैं और उद्धव गुट और शिंदे गुट का जन्म हुआ। इन्हीं उद्धव ठाकरे ने 2019 में जब बीजेपी के साथ चुनाव लड़ा था, तो उसके बाद जब चुनाव जीत गए बीजेपी से पल्ला झाड़ लिया और कांग्रेस के साथ जाकर सरकार बना दी, लेकिन हुआ क्या कुछ ही वर्षों में उद्धव ठाकरे की शिवसेना टूटने लगी और फिर एक बार यही देखने को मिला है संसद में उद्धव ठाकरे की शिवसेना के इस समय पर 9 सांसद हैं जिनमें से 6 सांसदों ने बगावत कर दी है। यह उसे दो तिहाई के आंकड़े को पार कर जाता है जो दल बदल कानून के अंतर्गत समस्या खड़ी कर सकता है। ऐसे में शिवसेना के इन बाकी विधायकों ने अपने लिए सुरक्षित रास्ता बना लिया है। यह जाकर शिंदे गुट में सम्मिलित होंगे और भारतीय जनता पार्टी को एनडीए सरकार को समर्थन देंगे। 

समाजवादी पार्टी भी सुरक्षित नहीं :

समाजवादी पार्टी के बड़े नेता रामगोपाल यादव ने एक पत्र लिखकर अमित शाह को भेजा है, यह बात कही है उत्तर प्रदेश में कैबिनेट मंत्री ओपी राजभर ने उनका कहना है कि इस पत्र के माध्यम से सब कुछ तय हो गया है कि समाजवादी पार्टी के कई नेता भी एनडीए को समर्थन देने वाले हैं कुल मिलाकर समाजवादी पार्टी में फूट पड़ चुकी है। ऐसे में समाजवादी पार्टी जो कि संसद में तीसरा सबसे बड़ा दल है कांग्रेस के बाद समाजवादी पार्टी के पास 32 सांसद हैं। यदि समाजवादी पार्टी में फूट की खबर ठीक है तो आने वाले उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव के लिए समस्याएं बढ़ गई है।

दक्षिण में डीएमके भी असंतुष्ट है :

तमिलनाडु में स्टालिन की बहुत बड़ी हार हुई इस हार के बाद राहुल गांधी से एक बड़ा धोखा भी उन्हें मिला। स्टालिन और डीएम के इस बात से आक्रोशित है क्योंकि जिस टीवीके के खिलाफ कांग्रेस के साथ मिलकर उन्होंने चुनाव लड़ा था। कांग्रेस ने जाकर उसी के साथ हाथ मिला लिया ऐसे में डीएम के ने अपना रास्ता बदल लिया है। उसका कहना है कि हम इंडिया एलाइंस और कांग्रेस का साथ अब नहीं देंगे। उस तरह से तो बिल्कुल भी नहीं। ऐसे में जो यह आक्रोश है इसका उपयोग संसद में एनडीए की सरकार कर सकती है, और इसकी काफी संभावनाएं हैं। 

एनडीए के अंकों का गणित समझिए :

2024 के लोकसभा चुनाव के बाद एनडीए सरकार के पास 293 सांसदों का समर्थन था। जिसके चलते सरकार बन सकी इसमें सबसे बड़ी पार्टी भारतीय जनता पार्टी जिसके पास 240 सीटें रही उसने नेतृत्व किया नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने। देश में 50% से अधिक सीटें या 272 से अधिक सीटों की आवश्यकता सरकार चलाने के लिए होती है लेकिन संविधान में संशोधन करने के लिए विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है जिसमें कुल संख्या के 50% से अधिक का आंकड़ा पार करना होता है। जो एनडीए आराम से कर लेगी और दूसरी बात कि जिस दिन संविधान संशोधन का विधेयक लाया जाता है और उस पर वोटिंग होती है जितने सदस्य उपस्थित होते हैं। उनका दो तिहाई का आंकड़ा पार करना होता है। संसद में लोकसभा की बात यदि हम करें तो इस समय पर कुल सीटों की संख्या 543 है। जिसका दो तिहाई लगभग 362 से 363 सदस्य होते हैं। ऐसे में बीजेपी के पास 293 पहले से ही समर्थक सदस्य हैं, 20 सांसद टीएमसी के जुड़ गए तो यह कुल मिलाकर 313 हो गए उद्धव की शिवसेना से 6 सांसद बागी हुए हैं इससे संख्या जाकर 319 पर पहुंच गई, और इसके बाद समाजवादी पार्टी और डीएमके के संसद में क्रमशः 32 और 22 सांसद हैं। उनके विषय में खबरें चल रही हैं बात साफ हो जाएगी की इन पार्टियों के भीतर कितनी आंतरिक असंतोष चल रहा है। दूसरी तरफ एनडीए की सरकार पूरी कोशिश कर रही है कि वह किसी भी तरह अपनी संख्या बढ़ा सके।।

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