राहुल गांधी | असफलताओं का अंबार लिए शीर्ष पर खड़े!

असफल राहुल गांधी :
बहुत समय बाद किसी नेता पर लिख रहा हूं किंतु लिख भी रहा हूं राहुल गांधी पर। कोई साधारण नेता नहीं है भारतीय राजनीति में ऐसे नेता जो सत्ता में रहें या विपक्ष में किंतु रहेंगे सबसे ऊपर ही ऐसे कई नेताओं में गांधी परिवार के नेता अव्वल रहे हैं। राहुल गांधी का राजनीति में होना इसका एक बड़ा कारण उनका परिवार ही है। उनका जन्म ही उन्हें विशेष अधिकार देता है, कोई कितना इसकी आलोचना करे किंतु आजादी के बाद यह क्रम जारी रहा। गांधी परिवार को कोई रोक न सका समय-समय पर अड़चने आई किंतु अंतिम तौर से उन्हें लांघ लिया गया।
हाल में भी स्थितियां वही है असफलताओं का अंबार लिए राहुल गांधी खड़े हैं और कांग्रेस का अक्षुण्ण समर्थक उन्हें सर्वोच्च नेता कहते नहीं थकता। किंतु वो यह विचार नहीं करता की राज परिवार में कभी-कभी कुछ राजकुमार राजनीति में उतने माहिर नहीं होते, इतिहास यही बताता है। ना ही वो यह विचार करता है कि यह लोकतंत्र है राज परिवार का दौर समाप्त हो चुका है। बात युवा और पढ़े-लिखे व्यक्ति होने की है तो देश में मेधावी पढ़े-लिखे युवा सिविल सर्विसेज की तैयारी पर ज्यादा ध्यान देते हैं। हो सकता था कि राहुल गांधी एक अच्छे प्रशासनिक अधिकारी होते किंतु उनकी नियति उनके जन्म के साथ तय हो गई थी रास्ते बहुत अधिक नहीं थे उन्हें बस इसी पथ पर चलना था जहां उन्हें केवल मिली है-
असफलता, असफलता, असफलता

कांग्रेस का मुखिया :
बात केवल यह नहीं है कि राहुल गांधी के हाथ असफलता लगी है किंतु कांग्रेस चाहकर भी सेनापति नहीं बदल सकती है यह बड़ी असफलता है।
2022 में कांग्रेस ने यह कहकर अध्यक्ष पद का चुनाव किया कि लोकतांत्रिक परंपराओं का निर्वहन किया जा रहा है। कांग्रेस पूर्ण रूप से पार्टी के अपने ढांचे में भी लोकतांत्रिक स्वरूप रखती है। वोटिंग की गई अध्यक्ष पद के लिए बहुत दुर्लभ तस्वीर थी एक और शशि थरूर थे, और दूसरी ओर मल्लिकार्जुन खड़गे। गांधी परिवार के तीन सदस्य प्रियंका गांधी, राहुल गांधी और सोनिया गांधी के होते हुए यह हो रहा था कि कोई अन्य व्यक्ति अध्यक्ष बने।
चुनाव हुआ और मल्लिकार्जुन खड़गे अध्यक्ष हो गए वहां शशि थरूर हार गए। जबकि शशि थरूर अधिक प्रभावी हो सकते थे उनकी हार गांधी परिवार की ही इच्छा थी। आंतरिक रूप से तो कौन अध्यक्ष बनेगा यह तय ही होता है। खड़गे जी को अध्यक्ष बनाना राहुल गांधी के लिए पार्टी के भीतर ही प्रधानमंत्री पद के लिए उस प्रतिस्पर्धा को समाप्त करना था जो आगे कभी पैदा हो सकती थी। यदि किसी प्रभावी और युवा चेहरे को अध्यक्ष बनाया जाएगा तो हो सकता है लोग उसके पक्ष में अधिक खड़े होने लगे और राहुल गांधी प्रधानमंत्री की दौड़ में अपनी ही पार्टी के भीतर किसी अन्य व्यक्ति से पिछड़ जाएं। यह रिस्क नहीं लिया जा सकता था और ऐसा ही हुआ।
राहुल गांधी को राजा होना ही होगा बस यह एक तथ्य है। जिस पर सवाल नहीं किया जा सकता भले कांग्रेस सारे देश में अपना सबसे बुरा दौर देख रही है।
तब के राहुल गांधी अब कहां :
जब राहुल गांधी ने राजनीति में आगमन किया था, उन्होंने अपने पिता को श्रेय दिया था, कि यह सब जो लोग उन्हें वोट देते हैं, इसलिए भी है क्योंकि यह उनके पिता की विरासत है। तब राहुल गांधी एक युवा किंतु आज से बिल्कुल अलग थे। उनमें कुछ नए विचारों की झोंक थी, और हवा को दिशा देने की ललक थी, वे उत्साहित भी थे। भले ही वह पैतृक विरासत के चलते वहां थे। किंतु एक युवा में कई आशाएं पनप रही होती हैं। यही उन पर तब भी थी। किंतु 2014 में हार के बाद वे देश को समझना शुरू करते हैं। पहले तो आवश्यकता भी न थी जब भी चाहते प्रधानमंत्री बन सकते थे। 2019 में एक बार फिर हार गए तो अब तो कैसे भी अपने आप को भारत की राजनीति में समझदार नेता बनाना ही था। तो कोशिश शुरू हुई वह एक प्रतिष्ठित और सम्पन्न परिवार के व्यक्ति हैं उन्हें आवश्यकता नहीं थी किंतु अब यह बहुत बड़ी जरूरत हो गई थी उन्हें "भारत जोड़ो यात्रा" और "न्याय यात्रा" इत्यादि से देश को समझाना पड़ा पहले इसकी आवश्यकता भी नहीं थी। उनकी मुसीबतें अब अधिक थी, तो रास्ता यही था कि देश की मिट्टी में अब लौटना ही पड़ेगा, राजमहलों से राजनीति का दौर अब जा चुका था।
आज भारत की राजनीति में अपना वोट बैंक तलाशते उसे खुश करते राहुल गांधी बहुत सधे हुए नजर आते हैं। देश की राजनीति में नया सूरज बन सकने वाले आज उन्हीं बातों में उलझे दिखते हैं जो पहले से ही उलझी हुई हैं।।
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