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world pharmacist day in hindi | फार्मेसी क्या है फार्मेसी के जनक

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  विश्व   फार्मासिस्ट डे प्रत्येक वर्ष 25 सितंबर को मनाया जाना सुनिश्चित है। यह फार्मासिस्टों द्वारा अनेकों लोगों को उनके स्वास्थ्य में सुधार के लिए किए प्रयत्नों को उजागर करने और उनके योगदान को बढ़ावा देने का दिवस है। मनाने की शुरुआत- 2009 में तुर्की ( इंस्ताबुल ) से एक अंतरराष्ट्रीय फार्मास्यूटिकल फेडरेशन (IFP) परिषद ने सर्वप्रथम इस दिन को यह महत्व देने की शुरुआत की थी। वर्ल्ड फार्मासिस्ट डे की शुरुआत करने वाला तुर्की से अंतरराष्ट्रीय फार्मास्यूटिकल फेडरेशन (IFP) का स्थापना वर्ष 1912 दिवस 25 सितंबर है। क्योंकि 25 सितंबर ही IFP का स्थापना दिनांक है, इसलिए भी तुर्की के IFP सदस्यों ने इस दिवस को ही आने वाले वर्षों में वर्ल्ड फार्मासिस्ट डे के तौर पर मनाए जाने की मांग की। इस वर्ष की थीम- वर्ल्ड फार्मासिस्ट डे मेहता उन फर्म स्टॉकिंग तमाम योगदान को देखते हुए हर साल एक नई थीम को इस दिवस पर निर्धारित किया जाता है 2020 में इस दिवस पर वर्ल्ड फार्मासिस्ट डे की थीम “Transforming global health” रखी गई थी। इस वर्ष 2021 में इस दिवस पर वर्ल्ड फार्मासिस्ट डे की थीम “Pharmacy: always trust...

23 september अंतरराष्ट्रीय संकेतिक भाषा दिवस | वर्ल्ड फेडरेशन ऑफ द डेफ

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अंतरराष्ट्रीय संकेतिक भाषा दिवस- 23 सितंबर को संपूर्ण विश्व में अंतरराष्ट्रीय संकेतिक भाषा दिवस के रुप में मनाया जाता है। यह दिवस विश्व में भाषा के उस प्रकार के महत्व को प्रकाश में लाता है, जो हम आज भी भाषा के इतने विकास हो जाने के पश्चात प्रयोग कर ही देते हैं। उदाहरण के लिए हम संकेत कर अपने दोस्त को दर्शाते हैं, कि गाड़ी उस और गई है,  तुम्हारी पेन उस डेस्क में है, तुम्हारी सीट वह है आदि। भाषा हमारे आचार विचारों को व्यक्त करने का माध्यम है, और सांकेतिक भाषा संकेतों की भाषा है, जहां हम अपने भावों विचारों को संकेतों के माध्यम से व्यक्त करते हैं। यह दिवस विश्व भर में सांकेतिक भाषा के उत्थान की ओर कदम है। इस वर्ष 2021 सांकेतिक दिवस की थीम “वी साइन फॉर ह्यूमन राइट्स” रखा गया है। वर्ल्ड फेडरेशन ऑफ द डेफ ( world federation of the deaf ) – अंतरराष्ट्रीय संकेतिक भाषा दिवस की अवधारणा सर्वप्रथम वर्ल्ड फेडरेशन ऑफ द डेफ ( WFD ) द्वारा की गई। WFD स्थापना वर्ष 1957 दिवस 23 सितंबर है, जो कि विश्व भर में 135 राष्ट्रों के बधिर लोगों के हितों के लिए प्रतिबद्ध हैं। उनकी गणना है, कि दुनिया भर में लगभग ...

उत्तराखंड में भाजपा की उभरती समस्याएं

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पार्टी का नेतृत्व खेमा बड़ा होने से अब भाजपा की उत्तराखंड में चुनौती भी बड़ी है, कि वे सभी बागी हुए तथा योग्य, बुजुर्ग सभी नेताओं को मनोवांछित सीटों पर टिकट दे, जीत हो तो मंत्रिमंडल में जगह दे, मुख्यमंत्री का पद दें। वही भाजपा पार्टी के उत्तराखंड में पहले से ही दिग्गज नेता अपनी भक्ति, लंबे समय से पार्टी में होने के फल में अपने ही विचार को पार्टी का विचार मानने की मनः स्थिति में आ चुके हैं। 2016 में एक ओर पहले से ही कांग्रेस से बागी नेता अपनी मुख्यमंत्री पद पर ताजपोशी के लिए अधीर हुए हैं। भाजपा उन्हें भी अपनी पार्टी में ग्रहण कर पूर्णतः पकाने का काम कर रही हैं। किंतु वह बागी नेता तो राजनीति में अरसे से हैं, अतः अब इंतजार करना उन्हें लाजमी नहीं, और राजनीति में लंबे समय से होने के कारण अधिक अनुभव के कायदे से यूं तो उन्हें ही मुख्यमंत्री के पद पर आसीन होना चाहिए, किंतु भाजपा के लिए तो वे इतने पुराने नहीं जितने कि वे राजनीति में पुराने हो चुके हैं। खैर एक ओर जहां नेताओं का भाजपा का दामन थामना हो रहा है। वही सीट पर यह समस्या होगी, कि टिकट दे किन्हें। पुरोला की ही सीट का हाल देखें कि विधायक र...

शहीद मनदीप सिंह नेगी | भारतीय सेना शौर्य और बलिदान | विशेष लेख

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भावपूर्ण श्रद्धांजलि   शहीद मनदीप सिंह नेगी  गांव बुरासी, ब्लॉक- पाबौ,  पौड़ गढ़वाल उत्तराखंड 2017 में गढ़वाल राइफल सेना में भर्ती भारत के लाल जवान मनदीप सिंह नेगी  जी को भावपूर्ण श्रद्धांजलि।    यह तो मालूम है। कि मृत्यु का समय हममें कोई तय नहीं करता, ना कोई जानता है। यह अज्ञात है। किंतु जब कारवां आसमानी हो, जीवन लय में हो, तो मृत्यु के विषय में कोई क्यों सोचे।    जिसके हर कदम राष्ट्र को समर्पित हैं, जीत राष्ट्र को समर्पित है, जुबान जोशीले नारों से राष्ट्र को बयां करती हो, और यह  भक्ति भाव जब उसे सरहद पर मजबूती से खड़ा करती है, तब उनके शरीर पर आई एक कोई खरोंच केवल उसकी ना रहे। उसकी थकान, उसकी भूख, उसकी प्यास राष्ट्र के 130 करोड़ लोगों में बंट  जाए।    उसकी राष्ट्रभक्ति उसका समर्पण का भाव उसे इतनी शक्ति दे कि उसका साहस कभी फीका ना पड़े। इस राष्ट्र के संपूर्ण यश में उसका योगदान अगणनीय है, वह उस यश की किरणों का स्रोत है। वह इस राष्ट्र का सूरज है।    उसकी राष्ट्रभक्ति का भाव तो पूरी दुनिया में पूजनीय है। वह भक्ति इतनी प्...

Boxer Jaideep Rawat | Step which made him

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Boxer Jaideep Rawat मु झे नहीं मालूम था, कि हमारे यहां से भी कोई लड़का मुक्केबाजी में खुद को आंकता होगा। अपना भविष्य एक मुक्केबाज होने में देखता होगा। तब जब वह इस खेल को जिसमें अपने करियर बनाने के लिए पहली दफा चयन प्रक्रिया में खड़ा था, मुझे तब यह मालूम नहीं था कि वह एक दिन इस खेल से दुनिया के सामने एक चेहरा प्रस्तुत होगा।    हम क्रिकेट खेल से चयन की आश में थे, और आप भी। यदि आप जयदीप के निवास क्षेत्र से होते तो आप भी क्रिकेट खेल में ही स्वयं को चयनित होने की लाइन में रखते। किंतु जयदीप ने ऐसा नहीं किया, उसने मुक्केबाजी को चुना। मुझे नहीं मालूम यह कैसे हुआ। एक पहाड़ी लड़का जो हम सब के साथ पल-बड़ा हो रहा हो, एक परिवेश, एक विद्यालय, एक से लोग, किंतु कैरियर के संबंध में जब खेल जहन में आया तो जिस खेल को चुना वह मुक्केबाजी। जयदीप जिस क्षेत्र से आते हैं, मैं निश्चित हूं यह कहने में, जयदीप ने यह खेल पहले कभी नहीं खेला था। हां टेलीविजन सुविधाओं के चलते देखा जरूर होगा।    दरअसल बात है 2014-15 की बैच की भर्ती के लिए महाराणा प्रताप स्पोर्ट्स कॉलेज देहरादून में आठवीं और नौवीं कक्षा...

रक्षाबंधन पर एक रीत | वैचारिक लेख by- diwakar

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राखी पर हमारे यहां एक चलन रहा है। भाई बहन का प्यार और राखी के अलावा। अब यह चलन अपने पहाड़ में ही है, या और भी विस्तृत है, यह मालूम करना रहेगा। बहन की राखी के साथ एक और राखी होती है। ब्राह्मण की भेजी राखी। अब तक भी यह चलन में है। हालांकि इस प्रकार का सामाजिक ताना-बाना तकरीबन कमजोर हो चुका है, और यह चलन भी। पड़ोस के पंडित जी जो सामने के मंदिर में होते हैं, राखी लेकर हमारे घर पहुंचे और सब को राखी पहनाई दरअसल मोहल्ले में पंडित जी एक मात्र यही हैं। जो हर कार्यक्रम संस्कार पर पूजा पाठ की विद्या जानते हैं। मोहल्ले में गांव जैसा व्यवहार पैदा हुआ होगा तो, और पंडित जी भी इकलौते मोहल्ले के कार्यक्रमों में पुजारी रहे हैं तो, मोहल्ले को स्वीकार भी है। जो लोग मोहल्ले में इस रीत से अवगत हैं, पुजारी जी उन लोगों से अवगत हैं, उन्होंने राखी बांधी हालांकि पंडित जी चमोली के हैं। हम चमोली के नहीं। पुश्तैनी गांव में पुरखों से आज तक यह रीत कैसे काम करती है। गांव में राखी भेजने वाले ब्राह्मण को राशि का ब्राह्मण कहते हैं। यह कुछ ऐसे है, कि वह हमारे या आपके कई पुस्तों से ब्राह्मण होंगे। तब उनके पुरखे और...

नारीवाद | Feminism in hindi

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समाज में एक औरत और पुरुष के किसी अपराध में होने पर अशिष्ट व्यवहार पर दंड देने वाले तीसरे व्यक्ति का उनके प्रति दृष्टिकोण कैसा होगा। यह औरत और पुरुष के संपूर्ण समुदाय के द्वारा किए गए असम्मानजनक कृत्यों के आंकड़ों से अनुमान कर सकते हैं। जैसे किसी विद्यालय में एक कक्षा के 10 बच्चों ने अवज्ञा की तो सारे विद्यालय में शिक्षक उसके कक्षा को संपूर्ण कक्षा को ही बिगड़ी कक्षा कहने लगते हैं। हो सकता है, कि आज भी विश्व में या अपने ही देश में पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं के द्वारा किए अपराधों की संख्या में तो समानता ना आई हो, और यदि अपने आसपास समाज में भी हम दृष्टि डालें तो सामान्य तौर से घरेलू हिंसा का अपराध हो या अन्य तो ज्यादातर पुरुष ही अपराधिक कटघरे में खड़े हैं। हालांकि कहीं पर औरत भी अपराधी है, यह अपवाद है। किंतु यह उतना नहीं जितना पुरुष वर्ग अपराधिक कार्यों में ऊंचे आंकड़े दे चुका है। इस प्रकार की दृष्टिकोण में और सामाजिक समीकरणों में जब एक अन्य व्यक्ति अथवा तीसरा व्यक्ति पुरुष और महिला को अपराध में पाता है, अथवा एक दूसरे पर आरोप मढते पाता है, तो विषय की जानकारी ना होने पर भी वह अधिकत...

गढवाली बोली | गढवली मा | मां की जुबान मातृबोली

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गढवाली बोली     शायद मेरी मां ला बचपन मा मी थैं इन नी सिखै होलो कि यु बिरौलो नी च ये कु  C A T  कैट बुलदिन, शायद वांकु परिणाम चा कि मि गढवली अपड़ी मातृभाषा थैं जणदूं छों। कम से कम इतगा जणदूं छों कि अपड़ी बात अपड़ी मातृबोली मा बोली सोकूं अर समझी सोकू।    ईं मातृबोली से हमरी मां की जुबान च हम मा। हमारी मां की संघर्ष की कहानी च हम मां। वा जुबान हम मा सदनी कु राली। या जुबान हमरी मां को ज्ञान च हम मा। जु हमारी मां थैं हम मा सदनी रखलो। वीं आपबीती थैं सदनी बयां करली या जुबान। या जुबान हम मा अर हमारी ओंण वली पीढी मा सदनी जिंदा राली अर वीं संघर्ष की कहानी थैं बयां कनी राली। बोला दौं क्या नी दे ईं बोली ला हम थैं।    ऊ लोग जौंका मन की बात सिर्फ ईं बोली मा ह्वे सकदी, ऊंका आखरूं थैं, ऊकां दुख सुख से हम थैं ज्वड़दी। या बोली मीं थैं ऊंका इतगा करीब ला के खड़ी करदी, मिं ऊं थैं जाणी सौकू यनु लायक बणोंदी।    गढवली बुलण वला लोगों की भावनाओं की कदर ऊं लोगों ह्वे सकदी, जुं थै वीं बोली की समझ हो। कदर तभी ह्वे सकदी जब वीं बात की समझ हो।