राठ क्षेत्र से मुख्यमंत्री आवास तक का सफर | राठ का तात्पर्य | विशेष लेख
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| Uttrakhand Holi |
एक होली की टीम ने पहल की वे देहरादून जाएंगे अपने लोगों के पास और इस बार एक नई शुरुआत करेंगे। कुछ नए गीत उनके गीतों में खुद का भाव वही लय और पूरे खुदेड़ गीत बन गए। खूब मेहनत भी की और इस पहल को करने का साहस भी किया। देहरादून घाटी पहुंचे और पर्वतीय अंचलों में थाली बजाकर जो हम होली मनाया करते थे, उसे विशुद्ध कलाकारी का स्वरूप दिया। हालांकि आज से पहले बहुत से शानदार टोलियों ने होली बहुत सुंदर मनाई है।।
बदलते समय के साथ संस्कृति के तमाम इन अंशो का बदला स्वरूप सामने आना जरूरी है, उसे बेहतर होते जाना भी जरूरी है। और यह तभी हो सकता है, जब वह प्रतिस्पर्धी स्वरूप में आए अर्थात एक दूसरे को देखकर अच्छा करने की इच्छा।
इस सब में सबसे महत्वपूर्ण है, संस्कृति के इन छोटे-छोटे कार्यक्रमों का अर्थव्यवस्था से जुड़ना अर्थात इन कार्यक्रमों से आर्थिक लाभ होना, यदि यह हो पा रहा है, तो सब कुछ उन्नत होता चला जाएगा संस्कृति भी। उदाहरण के लिए पहाड़ों में खेत इसलिए छूट गए क्योंकि शहरों में नौकरी सरल हो गई और किफायती भी। कुल मिलाकर यदि पहाड़ों में खेती की अर्थव्यवस्था मजबूत होती तो पहाड़ की खेती कभी बंजर ना होती।
गायकी के क्षेत्र में उत्तराखंड के कलाकार अच्छा कर रहे हैं। वह उसमें लगातार अच्छा करते जा रहे हैं। यह इसलिए है क्योंकि उस क्षेत्र ने उन्हें आर्थिक रूप से संपन्न भी बनाया है। उत्तराखंड में पर्यटन फलता फूलता है, यह इसलिए है क्योंकि वहां लोगों को रोजगार मिलता है ठीक ऐसे ही संस्कृति के इन छोटे कार्यक्रमों के कलाकारों को संवर्धन मिले लोगों का, राज्य का तो निश्चित रूप से संस्कृति का संरक्षण होता है। अन्यथा संस्कृति के वे तमाम परंपराएं, रीति और कार्यक्रम आउटडेटेड हो जाते हैं, ठीक वैसे ही जैसे हम सबके लिए "बाड़ी" एक पहाड़ी खाद्य व्यंजन अउटडेटेड भोजन हो चुका है क्योंकि उसका स्थान लेने के लिए सरल और सहूलियत भरे हमारे पास कई विकल्प हैं।
इसलिए संस्कृति के इन छोटे कार्यक्रमों का इस आर्थिक जगत में मुख्य धारा से जुड़ना जरूरी है, तभी उनका संवर्धन संभव है।।
राठ क्षेत्र का तात्पर्य क्या है यह कहां अवस्थित है-
यह पश्चिमी नायर नदी घाटी क्षेत्र में बसा है। इसे ही राठ क्षेत्र के नाम से जाना जाता है राठी होने का तात्पर्य अलग-अलग लोग अलग-अलग प्रकार से व्याख्या कर सकते हैं किंतु मूलतः इसे सभ्यता से पीछे छूट जाने वाले या पिछड़ेपन के प्रतीक के तौर पर देखा जाता रहा है।
बहुत से लोगों के लिए यह अपमान का सबक भी रहा है। इस बात पर बार-बार श्रीनगर विधानसभा के पूर्व विधायक रहे गणेश गोदियाल जिक्र करते हैं उनका यह कहना है की स्वयं राठ क्षेत्र के लोग राठी होने के इस नाम को अपने साथ जोड़कर नहीं देखना चाहते थे उनके लिए अपमान का विषय हो गया था लेकिन समय के साथ यह चीज बदली है अलग-अलग स्तर पर अलग-अलग लोगों ने काम करके इस नाम को सम्मान दिलाया है अब चीजें बदल रही हैं जैसे राठ की यह होली टीम किस तरह से गर्व के साथ आगे बढ़ी है और इन्होंने सांस्कृतिक विरासत का सुंदर प्रदर्शन किया है।
राठ के तात्पर्य को आप कुछ इस प्रकार भी समझेंगे कि यह मजबूत और संघर्षशील लोगों का क्षेत्र रहा है शिक्षा दीक्षा में जरूर कह सकते हैं कि ये कुछ पीछे रह गए लेकिन इतना जरूर है कि यह कृषि कार्य, पशुपालन और आत्मनिर्भर जीवन की जहां बात करते हैं उसमें बड़ी मजबूती से आज भी कई जगहों पर दिखते हैं कुल मिलाकर राठी होने का मतलब संघर्षशील जीवन जीने वाले लोगों के क्षेत्र से है। जो अपनी मेहनत के बलबूते पर जीवन यापन करते रहे हैं
राठ और सलाण यह दो शब्द एक दूसरे के विपरीत कहे जा सकते हैं सलाण जहां सभ्यता और समाज में सरल जीवन होने की बात है वही राठ जहां जीवन कठिन है संघर्षशील है जहां लोग मेहनत से कृषि करते हैं पशुपालन करते हैं और इसी के आधार पर जीवन जीने के लिए आवश्यक सामग्री हासिल करते हैं इस तरह वे काफी हद तक आत्मनिर्भर लगते हैं। पहले के दौर तक तो उन्हें बाजारों से कोई खास सामान खरीदने की आवश्यकता भी न थी। ऐसे आत्मनिर्भर जीवन के चलते वह समाज से इतनी मजबूती से ना जुड़ सके जिससे नवीन सभ्यता का तेज प्रसार इस घाटी में ना हो सका। बस यही से राठी होना पिछड़ेपन का प्रतीक हो गया।।
पश्चिम नयार की घाटी में यह क्षेत्र बसा है अब यह बदलाव की तेज धारा में सम्मिलित है।।

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