संस्कृतियों का उदय | विशेष लेख

दुनिया एक गति के साथ है। यह केवल धरती का घूमना सूरज के चारों ओर चक्कर लगाना मात्रा नहीं है, बल्कि धरती से बाहर उस ब्रह्मांड की गति, वहां हर कारण जो अपना चक्र पूरा कर रहा है। साथ ही धरती के भीतर हर प्राणी हर वस्तु और पदार्थ अपना समय बिता रहे हैं। यह सब एक चक्र में है और एक गति से प्रेरित हैं।

यह पदार्थ प्राणियों के संबंध में है। क्या यह मानव सभ्यताओं और संस्कृतियों के लिए भी सत्य है, कि वह भी एक चक्र में है, और एक चक्र पूरा कर लेने के बाद उनका काल भी समाप्त हो जाएगा।

हजारों साल पुरानी कोई सभ्यता यदि आज भी प्रासंगिक है, तो यह वह दूरदृष्टि है जो तब हजारों साल पहले आने वाले हजारों सालों के लिए स्थापित की गई, और लोग तब से आज तक उसका निष्ठावान अनुसरण करते हैं। दुनिया की गति के साथ या इस बीते समय के साथ स्थितियां और जीवन जीने के लिए साधन और विकल्प भी बदल रहे हैं।

यह बात तो स्वीकार करनी होगी, की सभ्यताएं तभी पनपती हैं जब मानव अपने लिए मूलभूत आवश्यकता के संसाधन जुटा पा रहा हो। भूखे और प्यासे व्यक्ति के लिए अन्न जल का मिल जाना ही सबसे बड़ी बात है, हर भोजन की तलाश में भटकते संसार के किसी भी अन्य प्राणी की ही भांति।

इस प्रकार सभ्यता पनपने के लिए आवश्यक है, कि वह प्राणी मूलभूत आवश्यकता के साधनों को प्राप्त कर पा रहा हो, अन्यथा भोजन के लिए द्वारा द्वारा भटकते किसी जानवर की जाति में क्यों सभ्यता नहीं पनप जाती। 

दरअसल आरंभिक विषय किसी भी प्राणी जाति के लिए जीवन जीने के लिए साधन जुटाने का ही है। यही सवाल है जो जन्म के बाद किसी प्राणी को गति देता है।

आज जहां हम हैं, मानव जाति जो अनेक सांस्कृतिक भूमिकाओं में बंटी हुई है। लड़ाई इस प्रकार भी है कि सभी एक ही संस्कृति को सर्वोच्च मान लें, उसे स्वीकार करें। इस प्रकार तो यह बड़ी लड़ाई है, और संभव दिखती नहीं।

लेकिन कौन संस्कृति है, जो अपने आपको जीवित रख सकेगी। एक तो वह जो सबसे अधिक दूरदृष्टि को दर्शा रही है, और दूसरी जो समय के साथ स्वयं को अनुकूलित कर रही हैं।।

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