Ashoka maurya | अशोक महान क्यों?

मात्र एक महान धर्म प्रचारक होने के साथ-साथ अशोक एक महान राष्ट्र निर्माता भी था। उसने अपने साम्राज्य में एक भाषा तथा एक लिपि का प्रयोग करवाया, यह भाषा पाली थी, और लिपि ब्राह्मी। उसके द्वारा बनवाए गए स्तंभ लेख, शिलालेख, स्तूप आज भी राष्ट्रीय समृद्धि है। अशोक की महानता को एक लेखक इन शब्दों में प्रस्तुत करता है कि-

“हम यही कहेंगे कि विश्व के भागीरथ भूपति भूधरों उत्तुंग शिखर शिखरों के मध्य अशोक को गौरी शंकर की गगनचुंबी शिखा ही मानना चाहिए। वह विश्व के राजनीतिक गगन मंडल का देदीप्यमान प्रभाकर है। जिस का अनुपम आलोक अमर रहेगा धन्य है। धन्य है वह धर्म धुरीण धनुर्धर जिसने अपनी धर्मायुध से धर्म हीनता धूली-धूसरित कर धर्म विजय की धवल ध्वजा फहराई, और धन्य है, वह धर्म धरा-धात्री जिसने अपनी पुनीत पयोधर से पावन पय-पान कराकर उस परम पुरुष का पालन पोषण किया, इसी से तो उसके चक्र को स्वतंत्र भारत के राष्ट्रीय झंडे में स्थान देकर भारत सरकार भारत की जनता से उसका अभिनंदन करा रही है और उसे अपनी श्रद्धांजलि अर्पित कर रही है”।

डॉक्टर हेमचंद्र रायचौधरी ने अशोक की महानता को कुछ इस प्रकार लिखा कि-

“भारत के इतिहास में अशोक का व्यक्तित्व बड़ा ही रोचक है, उसमें चंद्रगुप्त की क्षमता, समुद्रगुप्त की प्रतिभा और अकबर की धर्म निष्ठा विद्यमान थी”।

यह सबसे महत्वपूर्ण है, कि अशोक के जीवन में कलिंग विजय के पश्चात कभी ऐसा समय ना सामना हुआ, जिसमें अशोक को युद्ध में शरीक होना पड़े। अशोक राज्य के शासन को लोक मंगलकारी और प्रजा के भौतिक जीवन को सुख समृद्धि संपन्न मात्र न करने वाला बल्कि प्रजा के जीवन का नैतिक और आध्यात्मिक स्तर को ऊंचा करने वाला बताया है।

एक सम्राट जो भारत के विशाल साम्राज्य का सबसे बड़ा शासक है, वह अपनी युद्ध यात्रा का त्याग करता है, और सबसे महत्वपूर्ण हिंसा का त्याग कर देता है। यह घोषणा आत्यायियों को कितना बल देती होगी। किंतु यह अशोक के धम्म के प्रसार का ही प्रभाव रहा होगा, कि पड़ोसी अन्य राज्यों ने भी लोक मंगलकारी कार्यों को लक्ष्य रखा ना कि युद्ध को।यही कारण होगा की अशोक की सीमाएं उसके आजीवन कलिंग विजय के बाद स्थिर रही, और वह तब जब सम्राट शस्त्रों का त्याग कर देता है, किंतु आक्रमणकारियों ने शस्त्र त्याग दिए हों ऐसा तो नहीं था। यदि अशोक कलिंग के युद्ध के बाद भी अपने राज्य की रक्षा के लिए युद्ध में आशक्त था, तो वह उसके अहिंसा के धर्म, उसके स्वयं के निभा पाने में, उसकी आजीवन पीड़ा रही होगी।

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