प्रसिद्ध बुंखाल मेला, पौड़ी गढ़वाल| एक संस्मरण लेख

Bunkhal Mandir 
हर बार की तरह बुंखाल की सुंदर झलकियां इस बार भी प्रत्यक्षदर्शियों द्वारा सामने लाई गई हैं। और यह बेहद सुंदर हैं, और जो लोग मेले में नहीं थे, उन्हें यह और भी सुंदर लग रही हैं।

बहुत से दोस्तों की तस्वीर देखी जो अन्य दोस्तों को फ्रेम में लिए हैं। जिन से मेरी मुलाकात भी काफी समय से नहीं हुई है। मेले का मतलब ही यह है, मिलना।

Bunkhal Mela Before 2014

अब तो कई साधनों के माध्यम से हम एक दूसरे से जुड़े रहते हैं, संपर्क में रहते हैं। लेकिन पहले यह सब साधन नहीं थे, तो मेला बड़े उल्लास का विषय था, क्योंकि वहां जाने कौन-कौन मिलने वाला है, इसके लिए मन में उत्साह होता था।

इस वर्ष 2025 में 6 दिसंबर को बुंखाल मेले का आयोजन होना तय हुआ है। दरअसल बुंखाल जगह का नाम है, और क्योंकि यहां बहुत ख्याति प्राप्त मान्यता प्राप्त मां काली का मंदिर है, तो नाम हुआ बुंखाल काली मंदिर।।

पहली बार जब मैं बुंखाल मेले गया। शायद 2012 में तो मुझे याद है, तब सभी पैदल जाते थे। एक तंग रास्ते में जो बुंखाल बाजार के ठीक नीचे की ओर से जो रास्ता मलुंड गांव को जाता है, पर बागी के साथ एक बड़ी भक्तों की भीड़ जो पीछे से आ रही थी। वही ढोल दमाऊ और बागी के चारों ओर रस्सों के साथ और डंडों के साथ लड़कों की बड़ी संख्या साथ ही बच्चे, महिलाएं सभी मां काली के भक्त पूरे जोर-शोर से आगे बढ़ रहे हैं। बागी इससे विचलित भी होता है, और कभी कभी आगे को दौड़ने लगता है, और लोगों को जो उस पर बंधी रास्सियों को पकड़े हैं, खींचने लगता है। यह मेरे लिए तो डरने का मामला था। लगभग सभी लोग एक किनारे हो गए, क्योंकि रास्ता भी लोगों से पूरी तरह भरा हुआ था। ऐसे में अफरा-तफरी हो जाए लगभग संभव था। हम वैसे ही घर से लड़ कर आए थे। क्योंकि अकेले तो आ नहीं सकते थे, किसी के साथ ही आना था, और कोई क्यों दिन भर मेले में एक आफत के रूप में जिम्मेदारी का हाथ पकड़ कर घूमता रहे। ऐसे में हम आधा दिन किसी के साथ रहते थे, और आधा दिन किसी और के साथ। जो भी होता था सख्त निर्देश होता था, हाथ नहीं छोड़ना।

जहां बलि दी जा रही थी वहां मेरी मां ने मुझे उठा कर दिखाया। क्योंकि वहां भीड़ ही इतनी थी, चारों तरफ से लोग घेरे हुए थे। बली के स्थान के दोनों तरफ हथियार के साथ दो या चार आदमी थे। उधर बागियों को पहले पूरे खेत में घुमाया जाता था, उन्हें थकाने के बाद उनकी बलि दी जाती थी। लोग अपनी बकरी और बागी को किसी तरह से तो उतनी भीड़ में बलि के स्थान तक ला रहे थे। बकरियों की संख्या तो गिनना मुश्किल होगा। मैं यह देखता उससे पहले में उतर गया, मुझसे यह नहीं देखा जाता।

Bunkhal Mela 
                                      

तब बलि प्रथा पर खूब नारेबाजी हुआ करती थी। जागरूकता के लिए स्कूली बच्चों द्वारा सड़कों पर रैलियां निकाली जाती थी। विशेषकर बुंखाल मेले से एक-दो दिन पूर्व लगभग स्कूल क्षेत्र में रैलियां निकालते थे। 

बच्चों के माध्यम से घर-घर तक आवाज पहुंचीं। प्रशासन पहले से ही निर्देशित था। बहुत बड़ा जन-विरोध नहीं होगा, ऐसी स्थिति जब सरकार को महसूस हुई, तो 2014 में बलि प्रथा बुंखाल में निषेध है, कि घोषणा कर दी गई। यदि मैं ठीक हूं तो वह तिथि बुंखाल मेले की 26 नवंबर को तय थी। और प्रशासन के कड़े इंतजाम में मां काली के पूज्य स्थान में कहीं भी पशुबलि नहीं दी गई। लोगों ने दूर जहां से मां काली का स्थान दिखता हो,बली जरूर दी थीं। शायद यह भी खबर थी, कि कुछ बागियों को पुलिस तब जफ्त कर ले गई थी।

बलि प्रथा और लोगों में अपने लोगों से मिलने का उत्साह इस मेले का अहम आकर्षण था, और जोरदार भीड़ का कारण भी। अब यह सब सांस्कृतिक कार्यक्रम के माध्यम से किया जाने का प्रयास है। सांस्कृतिक कार्यक्रम मेले का मूल आकर्षण प्रतीत हो रहा है। अच्छा बजट लगाकर कार्यक्रम में लोकप्रिय कलाकारों की उपस्थिति से लोग मेले का शानदार आनंद उठा रहे हैं।

लेकिन मेले में भीड़ की उपस्थिति का सबसे अहम कारण बलि प्रथा और लोगों ने मिलन का उत्साह से अधिक और बड़ा मां बुंखाल काली के प्रति लोगों में आस्था की भावना है। यह मां काली के प्रति लोगों की श्रद्धा ही है, जो उन्हें तब से आज तक हमेशा से अपने गांव इस मेले के लिए खींच लाती है।

Bunkhal New Temple 

माँ भगवती बूंखाल कालिंका मंदिर का इतिहास

बूंखाल कालिंका का इतिहास स्थानीय किंवदंती से जुड़ा है, जिसके अनुसार लगभग 1800 ईस्वी में थलीसैंण के चोपड़ा गांव की एक लुहार की बेटी जंगल में खेलते समय खो गई थी। कई दिनों बाद, वह अपनी माँ के सपने में माँ काली के रूप में आई और मंदिर बनाने की मांग की। इसके बाद, आसपास के गांवों के ग्रामीणों ने मिलकर पत्थरों से मंदिर का निर्माण किया, और तब से यह भक्तों के लिए आस्था का केंद्र बना हुआ है। 

मंदिर की उत्पत्ति:-

यह कहानी लगभग 1800 ईस्वी के आसपास की है, जब थलीसैंण के चोपड़ा गांव की एक लोहार की बेटी ग्वाल के साथ बूंखाल में पशु चराने गई थी। छुपन-छुपाई खेलते समय, अन्य बच्चों ने उसे एक गड्ढे में छुपा दिया और बाद में उसे भूल गए।जब लड़की के न मिलने पर उसकी माँ ने खोजबीन की, तो वह कन्या माँ काली के रूप में सपने में आई और मंदिर बनाने की मांग की। ग्रामीणों ने, जिनमें चोपड़ा, नलई, गोदा, मलुण्ड, मथग्यायूं और नौगांव के लोग शामिल थे, कन्या की इच्छा का सम्मान करते हुए पत्थरों से मंदिर का निर्माण किया।

मंदिर की परंपराएँ:-

बलि प्रथा: सदियों तक, मंदिर में भैंसा और बकरे जैसे पशुओं की बलि दी जाती थी, और कुंड को उनके रक्त से भरा जाता था। वर्ष 2014 में, बलि प्रथा को बंद कर दिया गया।
नई परंपरा: बलि के स्थान पर, अब कुंड को नारियल के पानी से भरा जाता है। 
माँ भगवती बूंखाल कालिंका मंदिर का नया स्वरूप। 
आगामी 6 दिसंबर, 2025 को आयोजित होने वाले भव्य मेले के मध्य नजर मन्दिर में की गयी मूर्ति प्राण प्रतिष्ठा। 

जय माँ बूंखाल कालिंका।🙏

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