Joshimath Uttrakhand ऐतिहासिक,धार्मिक महत्व
जोशीमठ यह स्थल कुछ अप्रिय घटनाओं के कारण चर्चा का विषय बना हुआ है। जोशीमठ में बड़ी मात्रा में भूधंसाव हो रहा है। यह इतना गंभीर मामला है, क्योंकि उस शहर के अस्तित्व पर ही खतरे की तरह दिख रहा है। जोशीमठ जो ऐतिहासिक धार्मिक और सामरिक महत्व के बारे स्थान है। ऐतिहासिक इस प्रकार से जोशीमठ की स्थापना आदि शंकराचार्य ने आठवीं सदी में की। यह वही आदि शंकराचार्य हैं, जिन्होंने संपूर्ण देश को एकता के सूत्र में बांधने के लिए चारों दिशाओं में चार मठों की स्थापना की। श्रृंगेरी मठ, गोवर्धन मठ, शारदा मठ और ज्योर्तिमठ। ज्योर्तिमठ नाम इसलिए है, क्योंकि यहां आदि शंकराचार्य ने ज्ञान प्राप्त किया, यहां उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ। क्योंकि उन्हें ज्ञान रूपी ज्योति यहां प्राप्त की इसलिए यह ज्योर्तिमठ है। हर मठ के अंतर्गत एक वेद रखा गया है। ऋग्वेद की बात करें, तो यह गोवर्धन मठ के अंतर्गत रखा गया है। वही ज्योर्तिमठ के अंतर्गत जो वेद रखा गया है, वह अर्थवेद है। हर मठ में दीक्षा लेने वाले सन्यासियों के नाम के बाद संप्रदाय नाम विशेषण लगाया जाता है, जिस आधार पर वे उसी संप्रदाय के सन्यासी कहे जाते हैं। हर मठ का एक महावाक्य होता है। “अहं ब्रह्मास्मि” जो हम सब जानते हैं, श्रृंगेरी मठ का महावाक्य है। ज्योर्तिमठ का महावाक्य है- “अयमात्मा ब्रह्मा”
यह स्थान धार्मिक महत्व का है। यह स्थान जहां आदि शंकराचार्य ने भारतीय दर्शन की महत्वपूर्ण रचना शंकर भाष्य लिखी। यह स्थान प्राचीन समय से ही वैदिक शिक्षा का केंद्र बना रहा। आज तक यह बद्रिकाश्रम धाम का शीतकालीन गद्दीस्थल है। यहीं पूजा होती है।
सामरिक दृष्टि से भी जोशीमठ महत्वपूर्ण है, क्योंकि चीन के साथ अपनी सीमा को साझा करने वाला चमोली जिला वहां अर्धसैनिक बलों के लिए जोशीमठ एक अहम पड़ाव है, यहां से सैनिकों को सीमा तक संचालित किया जाता है। इसलिए यह स्थान अपना सामरिक महत्व रखता है।
जोशीमठ में लगातार भूधंसाव हो रहा है। ऐसा नहीं है, कि यह अभी प्रकाश में आया हो, यह पूर्व में भी प्रकाश में आया है। इस वक्त यह बेहद विकराल रूप में सामने आया है। इस वक्त पर जिन कारणों को सामान्य दृष्टि से देखा जा रहा है-
- क्षेत्र में चल रही हाइड्रो परियोजना कार्य जिसमें तपोवन विष्णुगढ़ जल विद्युत परियोजना का कार्य है।
- चार धाम ऑल वेदर रोड प्रोजेक्ट के तहत बदरीनाथ हाईवे पर हो रहे कार्य।
- जल निकासी की उचित व्यवस्था नहीं होना।
ऐसा नहीं है कि यह सब इतने विकराल स्वरूप में एकदम से चमत्कारिक ढंग से सामने आया हो। बल्कि यह लंबे समय से धीरे-धीरे सामने आ रहा था। जो पूर्व में भी प्रकाश में आया था। तत्कालीन सरकार ने कार्यवाही भी की। 1970 से ही जोशीमठ में भूधंसाव की घटनाएं सामने आ रही है। 1976 में तत्कालीन सरकार ने इस संबंध में एक कमेटी गठित की। तत्कालीन गढ़वाल मंडल आयुक्त महेश चंद्र मिश्रा उनका नाम की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन किया गया। कमेटी ने क्षेत्र का गहराई से अध्ययन किया। कारणों की जांच की और रिपोर्ट सरकार को सौंपी, कमेटी ने सुझाव दिए-
- जोशीमठ में वर्षा और घर से निकालने वाले जल की निकासी का उचित प्रबंधन किया जाए।
- अलकनंदा नदी के द्वारा होने वाले कटाव का रोकथाम किया जाए।
हमें यह समझना है, कि मैदानी क्षेत्रों में निर्माण कार्य और पहाड़ी क्षेत्र में निर्माण कार्य दो अलग बातें हैं। जिस गति से मैदानों में भारी कंस्ट्रक्शन हो सकता है, पहाड़ों में यह उतना संभव नहीं है, जो पहाड़ों को मैदान बनाने की प्रक्रिया चल रही है। यदि प्रकृति स्वयं कर रही है, तो ठीक है। किन्तु यदि यह मानव करेगा तो प्रकृति रिप्लाई करेगी। आपने निर्माण कार्य के लिए जो इस भूमी में परिवर्तन किया है, और उस परिवर्तन से जो इस भूमि में विरूपण हुआ है, उस विरूपण को संतुलित करने के लिए यह भूमी रिप्लाई करेगी। वह रिप्लाई भूगर्भीय हलचल होगी। और उसका परिणाम भूस्खलन, भूकंप, बाढ़ आदि अनेक आपदाएं होंगी।

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