पूरी कांग्रेस एक परिवार के सपने को पूरा करने में जुटी है | कौन जगाये कांग्रेस को!

कांग्रेस यूं तो पूरे देश में अपने तीव्र पतन को देख रही है। एक के बाद एक कई निराशाएं उसके हाथ लगी। एक चुनाव में जीत का जरा कुछ मिठास मुंह लगती है, तो अगले कई चुनाव हार कर वह फीका हो जाता है। अभी हाल में मल्लिकार्जुन खड़गे जी ने जो कि कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं एक ऐसा बयान दे दिया जिसके बाद उन्हें हताश और मानसिक दिवालियापन की स्थिति से जोड़ दिया गया। उन्होंने 21 मार्च 2026 को तमिलनाडु के चुनाव को लेकर एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में आतंकवादी शब्द का प्रयोग किया और यह शब्द प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए उपयोग किया गया। अब इस बात से धुआं तो उठाना था अगले ही दिन चुनाव आयोग की तरफ से कांग्रेस राष्ट्रीय अध्यक्ष को इस संदर्भ में कारण बताओ नोटिस जारी किया जाता है। विषय गंभीर बन गया तमाम नेताओं की प्रतिक्रिया आने लगी और कांग्रेस एक बार घिरी घिरी फिर से नजर आती है। अपने लिए खुद समस्याएं बुन रही है आज की कांग्रेस। 

यह बात कहने की है कि भारतीय जनता पार्टी के लोग अंधभक्ति में लीन हैं। किंतु कांग्रेसियों के लिए भी यह बात बिल्कुल गलत नहीं है गांधी परिवार की वंदना में कांग्रेसजनों ने वर्षों तक स्वयं को रखा है और उनकी राजनीति गांधी परिवार के नियंत्रण से कभी बाहर आ ही ना सकी, यूं कहें कि आज तो वे बेबस हैं की चाह कर भी बाहर नहीं निकल सकते उन्हें इस नेतृत्व को स्वीकार करना होगा, जो एक वंश से आगे बढ़ रहा है। अंधभक्ति तो यहां भी संपन्नता से पनप रही है, और सच कहें तो यह तो कुछ अधिक पुरानी भी है।।

2022 में जब कांग्रेस को बड़े भारी मन से चुनाव करवा कर किसी ऐसे व्यक्ति को कांग्रेस अध्यक्ष बनाने के लिए मजबूर होना पड़ा जो गैर गांधी परिवार का हो नरेंद्र मोदी के राजनीति में आने के बाद और देश के प्रधानमंत्री बनने के बाद यह एक कलचर जरूर राजनीति में विकसित हुआ है कि अब खानदान की विरासत के आधार पर कोई भी कम से कम प्रधानमंत्री तो नहीं बन सकता उन्हें संघर्ष करना होगा जनमानस के बीच खुद को साबित करना होगा और यही कारण है कि राहुल गांधी को जनमानस का अनुभव करने के लिए भारत जोड़ो यात्रा इत्यादि करनी पड़ी है।

कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव में मल्लिकार्जुन खड़गे एक तरफ थे और दूसरी तरफ शशि थरूर चुनाव में प्रतिभाग कर रहे थे हालांकि हम सभी जानते हैं कि यह पूर्व से तय रहता है भले वह कोई भी पार्टी हो की अंतिम रूप से विजई किसे मानना है चुनाव में मल्लिकार्जुन खड़गे विजई हुए लेकिन कांग्रेस का वह सिद्धांत या ताकत जहां वह अपने आप को युवा नेतृत्व की पार्टी कहती हैं राहुल गांधी जी एक युवा नेता के तौर पर प्रस्तुत होते हैं देश के लोगों में इस आधार पर एक बड़ा क्रेज पैदा किया जाता है लेकिन जब राष्ट्रीय अध्यक्ष की बात आई तो अगर राहुल गांधी एक युवा नेता अब राष्ट्रीय अध्यक्ष नहीं बनना चाहते तो उनके स्थान पर कोई और युवा नेता पद को संभाल सकता है। किंतु ऐसा नहीं हुआ मल्लिकार्जुन खड़गे जी को यह पद सोंपा गया वह भी तब जब कांग्रेस युद्ध स्तर की त्रासदी झेल रही है वह सिमट रही है। 

कांग्रेस में बात यही है कि वह कभी गांधी परिवार से हटकर राजनीति को नहीं देख सकते यूं कहें कि गांधी परिवार ही कांग्रेस हैं। अगर राहुल गांधी जी के सामने कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर किसी युवा नेता को कमांड मिलती है तो यह राहुल गांधी जी के राजनीतिक भविष्य के लिए और प्रधानमंत्री बनने की यात्रा के लिए कुछ अड़चन पैदा कर सकता है क्योंकि यह कांग्रेस के हीरो की लोकप्रियता को बांट सकता है कुल मिलाकर प्रधानमंत्री बनने के लिए राहुल गांधी और उस अन्य युवा नेता के मध्य एक प्रतिस्पर्धा पनप शक्ति है ऐसा हो सकता है कि वह युवा नेता आम जनमानस में कांग्रेस की दृष्टि से अधिक लोकप्रियता हासिल कर ले। किंतु कांग्रेस ऐसा होने नहीं दे सकती क्योंकि प्रभाव वंश का बना रहना चाहिए।

सच्चाई यही है कि जिस त्रासदी से कांग्रेस गुजर रही है इसमें नेतृत्व की जो अनुभवी आवश्यकता बनती है वह दिख नहीं रही। राहुल गांधी उस भार को वहन कर पाने में सक्षम नहीं। कोई व्यक्ति यदि बहुत बुद्धिमान जैसा कि कांग्रेसजन कहते हैं और राहुल गांधी विदेश से पढ़ाई करें हैं और पढ़ा लिखे हैं लेकिन इससे बात नहीं बन जाती कि वे चुनावी राजनीति के धुरंधर हों। राहुल गांधी इस अनुभव में मात खा गए।।

 डॉ मनमोहन सिंह जी भारत के पूर्व प्रधानमंत्री विद्वानजनों में गिने जाते हैं उनका योगदान अतुलनीय है। किंतु राजनीतिक दृष्टि से वह इतने लोकप्रिय नेता रहे ऐसा नहीं कहा जा सकता। भले वे देश के प्रधानमंत्री रहे किंतु वह कभी किसी सदन का चुनाव नहीं जीते लोकसभा या विधानसभा में वे चुनाव जीतकर नहीं पहुंचे। 

संपूर्ण कांग्रेस आज गांधी परिवार के अधूरे सपने को साकार करने के लिए प्रयास में रत है उसे कुछ और नहीं देखना। वह जीत के लिए प्यासी है, किंतु सुधारों पर वे विमर्श नहीं करना चाहते क्योंकि बात वंश पर आ जाएगी।।

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