West Bengal में ममता युग का अंत यही | ModiNama

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पश्चिम बंगाल की राजनीति अब अपने चरम पर हैं। चुनाव से ठीक पहले रेलिया का दौर है। नरेंद्र मोदी और अमित शाह जैसे देश के दिग्गज नेता पश्चिम बंगाल पहुंचकर परिवर्तन का नारा दे रहे हैं। रही बात सत्तारूढ़ दल टीएमसी की तो वह भी पूरी ताकत के साथ बंगाल में बंगाल मॉडल की बात कर रहा है। क्षेत्रवादी शक्ति के तौर पर अपने आप को प्रस्तुत कर रही है, और इसी प्रयास में है कि किसी तरह से बाहरी दल के तौर पर राष्ट्रीय दलों को एक बार फिर से बड़ी मात दी जा सके। यह बड़ा दिलचस्प चुनाव होने जा रहा है, क्योंकि एक तरफ राष्ट्रवादी राजनीति का धड़ा कहे जाने वाली भारतीय जनता पार्टी का जोर है, और दूसरी तरफ तृणमूल कांग्रेस जो इस समय अपनी सत्ता को बचाने के लिए पूरी तरह से क्षेत्रीय अस्मिता और बंगाली एकजुटता की बात कर रही है।।

बंगाल में आने वाले 23 और 29 अप्रैल को दो चरण में वोटिंग होनी है। इसके बाद 4 मई को परिणाम भी सामने होंगे पश्चिम बंगाल के अलावा असम में पुडुचेरी में और केरल में भी चुनाव होने हैं। जिसमें असम चुनाव की प्रक्रिया हो चुकी है, वोटिंग वहां पूरी हो चुकी है, परिणाम आना बाकी है। इस तरह से देश के दूरस्थ राज्यों की चर्चा इस समय पर राजनीतिक गलियारों में सर्वाधिक है। पश्चिम बंगाल की राजनीति इसलिए दिलचस्प हो जाती है कि यह लंबे समय से राष्ट्रीय दलों की पकड़ से दूर रहा है। क्षेत्रीय संगठन तृणमूल कांग्रेस यहां का एकाधिपति रहा है। और उसमें ममता बनर्जी सियासत के सर्वोच्च शिखर पर जब विराजमान हुई तो उनका विकल्प कोई बन न सका।

इससे पूर्व 2021में पश्चिम बंगाल में जो चुनाव हुए उन चुनाव में बीजेपी क्योंकि कुछ बढ़त बना सकी, उस बढ़त ने ही उसे इस समय पर भी उम्मीद देकर रखी है। बीजेपी का यही मानना है कि यह उसके विजयी होने का समय है। किंतु सच यह भी है तृणमूल कांग्रेस, बीजेपी के बढ़त बनाने के बावजूद 2021 के चुनाव की बात हम करें तो भी बहुत अच्छा प्रदर्शन करने वाली पार्टी रही है। भाजपा यदि यहां कुछ अच्छा कर भी पाती है तो भी शायद वह ममता बनर्जी के गढ़ को ढहा पाए यह आसान नहीं होगा। किंतु अब तक के रुझानों में बीजेपी ने विशाल रेलियों से अपनी ताकत को पश्चिम बंगाल में साफ कर दिया है, कि वह पूरी तरह से तैयार है। नरेंद्र मोदी और अमित शाह के भाषणों में पश्चिम बंगाल की परिवर्तन की राजनीति को सुर देने का प्रयास है।

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2021 के चुनाव में बीजेपी ने कुल 294 विधानसभा की सीटों में 72 सीट हासिल करने के बाद मुख्य विपक्षी दल के तौर पर स्थान हासिल किया। लेकिन अगर हम बात करें तृणमूल कांग्रेस की तो वह 215 सीटों पर विजई रही। दरअसल बात यहां केवल यह नहीं है कि भाजपा ने अच्छी बढ़त बनाकर 72 सीटें हासिल की और यह तृणमूल कांग्रेस के लिए नुकसान रहा हो, बल्कि पश्चिम बंगाल में वामपंथी दल और कांग्रेस जैसी पार्टियों सिमट कर रह गई है। उनका वोट बैंक गिरा है, बंगाल की जनता का रुझान पूरी तरह से या तो बीजेपी या तृणमूल कांग्रेस की तरफ बढा है, और यही कारण है कि वे दोनों पार्टियों ने 2021 के चुनाव में बढ़त बनाई है। और अन्य सभी दल धीरे-धीरे सिमटते चले गए हैं। एक समय पर पश्चिम बंगाल वामपंथी दलों का गढ़ हुआ करता था। लेकिन आज वामपंथी दल पश्चिम बंगाल में शून्य पर सिमटे हैं। कांग्रेस की भी 2021 के चुनाव में यही स्थिति रही। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पश्चिम बंगाल में अपनी रैली में यह कह दिया की बंगाल की जनता ने समय-समय पर उन विरोधी ताकतों के गुरुर को चकनाचूर किया है। पहले अंग्रेजों का फिर कांग्रेसियों का वामपंथियों का और अब 2026 के चुनाव में बंगाल की जनता तृणमूल कांग्रेस को भी यही मुकाम दिलाने वाली है। और इस तरह से परिवर्तन का नारा बीजेपी के साथ बंगाल में चल रहा है।

बीजेपी को पश्चिम बंगाल की राजनीति को राष्ट्रवाद के धुरी में लाना है। उन्हें SIR के मुद्दे को और महिला सुरक्षा जैसे मुद्दों को साथ ही पश्चिम बंगाल में क्षेत्रीय ताकतों के प्रभाव में राष्ट्रीय लाभ की योजनाओं से दूर रह गया है यह बात रखनी है। बात आयुष्मान योजना की हो या विश्वकर्मा योजना की इसका जिक्र करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पश्चिम बंगाल में टीएमसी सरकार पर केंद्र के साथ मिलकर ना चलने का आरोप लगाया।

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