US - Iran युद्ध विराम वार्ता फेल
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| USA-IRAN |
इस्लामाबाद में हो रही शांति वार्ता सफल नहीं हो सकी है। लगभग 14 घंटे तक चली इस वार्ता में अंतिम तौर से महत्वपूर्ण विषयों पर सहमति नहीं बन सकी है। जे डी वैंस जो कि अमेरिकी उपराष्ट्रपति हैं, और अमेरिका का नेतृत्व कर रहे थे, ने पहले ही इस बात को कुछ हद तक साफ कर दिया था वार्ता में भी गहरा तनाव है। यह पूर्व से दिख रहा था।
बातचीत:
- 14 घंटे चली इस्लामाबाद में ईरान और अमेरिका की वार्ता।
- लिखित दस्तावेजों को दोनों देशों के प्रतिनिधियों ने आदान-प्रदान किया।
यह वार्ता बेहद महत्वपूर्ण:
वास्तव में देखे तो मिडल ईस्ट में युद्ध का महान खतरा मंडरा रहा है। अब तक की तबाही को पूरी दुनिया ने देखा भी है, और इसकी वजह से संपूर्ण दुनिया जो संकट में आकर खड़ी हो गई है, यह साधारण नहीं है। यह एक वैश्विक आपदा के समान है। ऊर्जा संकट और होर्मूज को लेकर पूरे विश्व में समस्याएं बढ़ गई है। निरंतर इस बात पर संकट गहरा जा रहा है, यह तो पूर्व से ही दिख रहा था की दोनों देश बेहद गंभीर मांगो के साथ इस वार्ता में उतरे हैं।
ईरान का पक्ष:
ईरान ने साफ किया कि कुछ मतभेदों पर वार्ता जारी रहेगी। जो महत्वपूर्ण हैं उन्हीं को लेकर ईरान का यह बयान था। दरअसल होर्मूज को लेकर युद्ध की तबाही को लेकर, भरपाई को लेकर, परमाणु समझौते को लेकर अभी तकरार जारी है। साथ ही ईरान यह भी जानता है, कि इस युद्ध में उसने अपने बेहद श्रेष्ठ अधिकारियों को खोया है। यहां तक की सुप्रीम लीडर तक की इस युद्ध में मृत्यु हो गई। इस बात से आप यह अंदाजा लगा सकते हैं, कि ईरान के लिए यह युद्ध एक भीषण त्रासदी के तौर पर रहा है। ईरान यदि अमेरिका की सभी शर्तों को मान जाता है। तो यह उसके देश के लिए अपयस होगा या जनमानस की भावनाओं के विरुद्ध होगा। इसलिए वह भी अपनी बातों पर अड़ा है। कुल मिलाकर युद्ध का परिणाम ईरान की हार है, ऐसा वह नहीं दिखाना चाहता लेकिन यह गतिरोध को और अधिक बढ़ता है।।
अमेरिकी पक्ष:
अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वैंस के नेतृत्व में पाकिस्तान इस्लामाबाद पहुंचे अमेरिका का प्रतिनिधिमंडल जिसमें उपराष्ट्रपति के साथ विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और वरिष्ठ सलाहकार जैरेड कुशनर भी शामिल रहे हैं। अमेरिका अपने आप को सदैव से विजेता के समान मानता है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में तो यह और भी अधिक गहरी भावना बन गई है। अब अमेरिका अपने किसी भी विषय पर जरा भी समझौता नहीं करता है। निश्चित रूप से वह युद्ध के विजेता के तौर पर समझौते में उतरा है, और वह ईरान के सामने उन्हीं मांगों को लेकर है, जो युद्ध से पहले तनाव का कारण बनी यह अमेरिका का अधिक रहना भी सहमति को पूरा नहीं होने देता।।
अंतिम अवसर है यह समझौते की पहल:
इस भीषण युद्ध में यह एक दुर्लभ तस्वीर है कि अमेरिका और ईरान दोनों पक्ष प्रत्यक्ष रूप से आमने-सामने हैं। बातचीत के मंच पर हैं। पाकिस्तान को वैश्विक स्तर पर जरा खुशी का कारण भी मिला है। वह भी सोचता होगा कि यह सफल हो जाए। सच कहें तो केवल वह नहीं बल्कि संपूर्ण विश्व इस पर नजर बनाए हैं कि यह सफल हो। यहां दोनों पक्ष बड़े संवेदनशील उद्देश्यों को लेकर युद्ध विराम की मांग कर रहे हैं। युद्ध विराम दोनों का उद्देश्य है, लेकिन मांगो का भार बहुत अधिक है। यह इस युद्ध विराम के समझौते को कमजोर करती हैं।
लेकिन बात केवल इतनी नहीं है, यह बेहद नाजुक क्षण है। जिसे सर्वोत्तम ढंग से भुनाया जाना जरूरी है। लेकिन ऐसा अब तक प्रतीत नहीं होता बयानों से यह साफ हो रहा है, कि यह वार्ता असफलता की ओर बढ़ रही है किंतु इसके बाद वार्ता का यह मंच शायद ही कब सजेगा।
ईरान ने मांगो को बताया:
ईरान ने तो यह तक कहा है, कि अमेरिका की कुछ पेचीदा और बेबुनियाद मांगो की वजह से यह समझौता नहीं हो सका है। ईरान ने अपनी मांगों को साफ किया है, उसका कहना है कि होर्मुज पर नियंत्रण को लेकर सहमति बनने में कठिनाई है। फ्रिज की गई संपत्तियों की रिहाई को लेकर ईरान की मांग है। भीषण युद्ध जो लगभग एक माह तक चला है उसे युद्ध की क्षती का मुआवजा पाना भी ईरान का हक है, और इस समझौते में ईरान की मांग का हिस्सा रहा है। क्षेत्रीय युद्ध विराम को प्राथमिकता दी जाएगी, यह भी ईरान का इस समझौते को लेकर एक महत्वपूर्ण मुद्दा रहा है। ईरान लेबनान में भी युद्ध विराम की मांग कर रहा है। जहां पर इसराइल लगातार हमलों को जारी रखे हुए है। इसराइल अभी इस युद्ध विराम के प्रयास में सक्रिय रूप से नहीं दिखता है। अमेरिका जरूर प्रतिनिधित्व कर रहा है। बेरुत में भी आकाश में ड्रोन और लड़ाकू विमान की गतिविधियां देखी गई है। और इसे लेकर हिजबुल्ला ने जवाबी कार्यवाही की है यह भी खबरें सामने हैं।
आगे क्या:
अब तक अमेरिका के उपराष्ट्रपति अपने प्रतिनिधि मंडल के साथ अमेरिका की ओर रवाना हो चुके हैं। यह संभावना पूर्व से भी थी, क्योंकि दोनों पक्षों की मांगे अभी वही है, जो इस युद्ध के जन्म का कारण थी। दोनों अपने-अपने स्तर पर विजेता हैं। और समझौते में इसी प्रकार से उपस्थित हुए हैं। जैसे अपने-अपने पक्ष में विजयी रहे हैं। दोनों ही देश युद्ध के विजेता के तौर पर इस समझौते की मेज पर बैठे हैं। तो दोनों की मांगे अधिक है और कोई मानने को तैयार नहीं, फिर समझौता कैसा सवाल तो यह है।।

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